Thursday, April 11, 2024

शिवायन

 श्री कृष्णुम्बहू भर्तारम व्यक्तं वन्दे शिवायनम 

विश्वोद्भव स्थितिलयाय शुभंकराय भक्तार्तिनाशनरताय दिगम्बराय 

यक्षस्वरूप परकारण कारणाय नित्यं नमोस्तु मृडसाम्बसदाशिवाय.1

सर्वेश्वरो विजयातम परिसर्पि सर्वसंतान शक्तशय संवलिताक्ष माला 

लीला विलास लुलदंगुलिलास्य लीना गौरी ललाय लपना लपनाभिलाषी.2

सर्वेश्वरीमभि नमामि विभासमानां वामोसमाश्रितवतीं परमेश्वरस्य.

नमं कराब्ज मिथुनेन सभाजयन्तीं शंभोस्स्वललुलित पिंग जटाकलापम .3

हे शर्वशंकर महेश परेष भर्ग शंभो त्रिलोचन शतीश्वर वामदेव 

भूतेश उग्र प्रमथाधिप रामपूज्य सिद्धिप्रदः पशुपते भवभूति धाम.4

भागवत पाठक "श्यामल"

Tuesday, February 23, 2021

नंदन वन में

बैद्यनाथ साहित्योत्सव 

कविता विहरत नन्दन वन में,
तीन दोष की औषधि ढूंढत बैद्यनाथ के वन में।
भाव छँद रस भूषित अक्षर 
शंकर के नर्तन में।
पद विक्षेप चमत्कृत नभ में,
कुसुमित तरु कानन में।
झर-झर निर्झरिणी के निर्मल जल के कल-कल स्वर में।
कवि समूह के मुखरित ध्वनि भाव भंग के स्वर में।
कालजयी शिव की कविता है,
शब्दब्रह्म डमरू में।
हे नटराज कवीश्वर शंकर
वास् करो हम सबमें।
छँद ताल रस भाव भंगिमा, 
सहज सहेली संग में।
कविता विहरत नंदन वन में।
©आचार्य भागवत पाठक श्यामल

Tuesday, February 5, 2019

साम्प्रदायिक एकता की तपोभूमि

साम्प्रदायिक एकता की तपोभूमि 
(आज की संकीर्ण मनोवृति पर मूक अट्टहास)

                    उत्तरी छोटानागपुर के गिरिडीह जिले एक छोटा सा क़स्बाईनुमा इलाका है खरगडीहा जो उसरी नदी के तट पर बसा हुआ है. वर्षों पूर्व यहाँ एक संत रहते थे मस्तमौला ,सांसारिक प्रपंचो से लापरहवाह।  हृष्ट-पुष्ट दिव्य दृढ एवं अमिन सभ्यता की  प्रशान्त तेजस्विता से मंडित।  बारहो महीने कमर में एक पतली सी विरक्त लंगोटी कसे हुए और इसके सिवा जैसे उन्हें किसी प्रकार के वस्त्र की आवश्यकता ही नहीं थी.शायद इसीलिए  लोग इस संत को लंगटा बाबा  के नाम से जानते थे। ब्रह्मलीन हो जाने के बाद उस परम हंस का स्मरण दिलाता है उसी स्थान पर निर्मित समाधि पीठ जहाँ पौष मास की पूर्णिमा को अपार जनसमूह श्रद्धांजलि अर्पित करने टूट पड़ता है। जहाँ जातीय एवं साम्प्रदायिकता का दायरा विशीर्ण हो जाता है। पंडित और मौलवी समान रूप से एक ही जगह बैठकर पूजा अर्चना करते हैं.हिन्दू हो या मुस्लिम सभी यहाँ सिर्फ मनुष्य होकर रह जाते हैं. साथ ही साथ चादर तथा अन्य उपहार समर्पित करती है.
                       जिन्हे विश्वास न हो जाकर अपनी आँखों से देख सकते हैं सबके लिए खुला है वह द्वार। न वह मंदिर है न मस्जिद न गिरिजाघर न गुरुद्वारा।आप चाहें जो नाम दे दें स्वीकार है उस पुनीत समाधि को. जहाँ दबी है शीतल राख पंचभूतों की ,एक प्रकट रहस्यमय संरचना की इतिश्री।
                     उसरी नदी का लघु सेतु मानो आते -जाते लोगों के लिए संसार की मूक दार्शनिकता का सचेतक सा निर्निमेष छोटे -छोटे गड्ढो से उलीच कर जल भरने वाली पनिहारिनों को देखता रहता है।  पश्चिमी तट पर स्थित पथ निर्देशक पाषाण स्तम्भ मानो त्रिकोणात्मक विश्व पथ का रहस्यात्मक प्रतिबिम्ब सा रामानुज दर्शन के प्रतीक सा नए राहगीरों को कुछ क्षण रोक कर योग्यता अनुसार निर्देश देता हुआ अविचल खड़ा है. आश्रम के द्वार पर हलवाइयों की मधुर कलकल झुण्ड के झुण्ड मिष्टान्न रस लोलुप भौंरों की झंकार ग्राहकों को सचेत करता सा प्रतीत होता है. जाति विहीन आश्रम में छोटे छोटे बालक अमरुद के पेड़ों पर झूलते हुए वानरों का भ्रम पैदा करें तो आश्चर्य नहीं करना चाहिए।
    स्थानीय और दूर-दराज के प्रेमी भक्त पहले पब्लिक बस की धक्कम  -धुक्की तथा डाक ढोने वाली स्टेट बस की उखड़ी पटरी पर कपड़े फटने और काँटी चुभने के बचने के लिए अकसर  पैदल ही समाधि स्थल पर फूल और चादर चढाने  आते  थे अब तो साधनों की भरमार है.
     हमने सुना है की यहाँ पहले राजाओं का गढ़  था जिनका मुस्लिम शासकों के साथ मुकाबला हुआ था. मेरा अनुमान है की कबीर ने अपने ज़माने में जो समन्वय प्रस्तुत किया था ,गोस्वामी तुलसी दास के मानस ने जो शीतल सरिता प्रवाहित की थी सम्भवतः लंगटा  बाबा की इह लीला का निदर्शन आज उनकी समाधि के रूप में हमारे सामने सत्ता लोलुप मानव जाति की संकीर्ण मनोवृति पर मूक अट्टहास कर रहा है।
    मनुपुत्रों का विभाजन कौन करता है?,जाति ,रंग बल ,धन ,देश ,मान ,मर्यादा ,रीति संस्कार ,शिक्षा क्या है ?वह जो हमे हमसे अलग करता है। हम देखते हैं लोग कुत्ते पालते हैं। भेड़ ,बकरी ,मुर्गी,गाय भैंस ऊंट घोड़े बिल्ली,पक्षी ,सांप बिच्छू ,बाघ भालू ,बन्दर आदि खूंखार हिंसक घातक पशुओं को बड़े प्रेम से पालते हैं ,नहलाते हैं ,भोजन पानी की व्यवस्था करते हैं। उनकी सुख सुविधा के लिए स्वयं पसीना बहाते  हैं। आप कहेंगे की ये सब आर्थिक सुख सुविधा के लिए करते हैं. बात ठीक है जब ऐसे हिंसक पशु हमारे लिए लाभकारी हो सकते हैं तो फिर  मानव मानव के लिए पशुओं से अधिक लाभकारी नहीं हो सकता ?
    हर मानव सहमत होगा और इस प्रश्न का उत्तर सकारात्मक ही देगा यह मेरा अखंड विश्वास है।  फिर वह कौन सी विषग्रंथि है जो मानव तरुवर की जड़ में बैठी शाखाओं में विैषबीज पैदा करती है ?
 मेरी हलकी बुद्धि में एक तथ्य प्रकट होता है ,दो अक्षरों की जगमगाहट निखरती है ,एकार्णव में  ब्रह्मा को दो अक्षर सुनाई पड़े तप  और उन्होंने तप के द्वारा इस सम्पूर्ण विश्व का सृजन किया। उसके बाद विष्णु को भी सुनाई पड़े रक्ष।  शंकर को भी दो अक्षर सुनाई पड़े हर और वे हर हर करते हुए स्वयं हर हो गए ,सोचा मेरी बारी अभी नहीं आयी है तब तक समाधिस्थ हो कुछ और निर्देश प्राप्त करूँ। कुछ दिनों की साधना के उपरांत उन्हें ऐसा महसूस हुआ की हर हल हो गया और विष्णु का सहयोग करने लगे हल रक्ष का सहायक हो गया। यहाँ तक की वे दोनों मिलकर हरिहर हो गए। ब्रह्मा को इस रहस्य की जानकारी है या नहीं मैं नहीं जानता पर मुझे जो दो अक्षर सुनाई पड़े वे कभी उलट पलट जाया करते हैं।  ह स तो कभी स ह, मैंने दोनों की संगति बिठाने का प्रयास किया हस सह और दोनों अक्षरों को क्रमशः सजा लिया हससह अब उल्टा पुल्टा एक समानार्थक शब्द बन गया।
संस्कृत व्याकरण की दृष्टि में सह का प्रयोग करने पर कर्ता गौण हो जाता है जिसमे अंग्रेजी ग्रामर के अनुसार की विभक्ति लगती है ,और यही बात संस्कृत व्याकरण के अनुसार भी सही है।  इस प्रकार व्याकरण से निर्मित शुद्ध सह शब्द का योग अगर मानव के जीवन में सहयोंग करने लगे तो सहिष्णु, सहयोगी ,सहकर्मी,सहगामी बनकर शिव के पास चले तथा हर से हल पाकर विष्णु के रक्ष पद की रक्षा में तत्पर हो जाय।
   लंगटा बाबा की समाधि से यह शब्द यहां आनेवाले  भक्तों को सुनाई पड़ता है या नहीं मुझे नहीं पता परन्तु मैं जहाँ तक जा पाता  हूँ यह शब्द मेरा पीछा नहीं छोड़ता। मैंने उलटने का प्रयास किया सह को हस करके पीछा छुड़ाने का प्रयास किया परन्तु दोनों ही मेरे पीछे लग गए. मैं सम्पूर्ण विश्व के मानवों से करवद्ध प्रार्थना करता हूँ की सबलोग एकजुट होकर मुझे इस कष्ट से छुटकारा दिलाने का प्रयास करें ,सभी सह को अंगीकार कर हँसते हुए नए युग का निर्माण करें।
भागवत पाठक 'श्यामल '

Saturday, October 27, 2018

हालात क्या है यहाँ

परम् पूज्य हे परमपिता,हमें जो भेजा तूने यहाँ
हालात जो फिलहाल है, करता हूँ उसको बयाँ।

नाम के लिए भी होते हैं बड़े काम यहाँ
काम करनेवाले भी होते हैं बदनाम यहाँ।
सुबह होता ठंडा तो गर्म होती शाम यहाँ
देशी बना विदेशी जैसा छलकता जाम यहाँ।

बारूद के धुएं में दिखती है दीवाली यहाँ
लगता है निकल गया दिमाग का दिवाला यहाँ
बाला यहाँ, हाला यहाँ,बिकता है ताला यहाँ
कभी-कभी मेला,अक्सर होता है रेला यहाँ
भूत भी फेंकते है घरों में रात को ढेला यहाँ।

खेतों में उपज रही ऊंची अटारियाँ
हरजगह थिरकती अधनंगी नारियाँ।
बेरोजगारी का हल्ला है,चोरबाजारी का गल्ला है
पढ़े लिखे बाप का भी बेटा पड़ा निठल्ला है।

फौलादी पँखो से उड़ते है लोग यहाँ
बारूदी सुरंगों में पड़ते हैं जहां तहां।
अलग बोलियों का दिखता मेल यहाँ
रोज हड़ताली भरते हैं अब जेल यहाँ।

साल 6 महीने में बदलती सरकार यहाँ
बातों ही बातों में निकलती तलवार यहाँ
चारो तरफ है फैला विद्युत का तार यहां
हर जगह है कचड़ों का लगा अम्बार यहाँ।

लूट जाते खड़े राहगीर सरेआम यहाँ
शासन के सिपाहा करते परेशान यहाँ
बड़े अक्खड़ लहराते पियक्कड़
शानदार जानदार छलकाते हैं जाम यहाँ।

हर तरफ सूखा है,आदमी सब भूखा है यहाँ
मौज में बैठा है भैंसा पड़ा पगुराता है यहाँ
यहाँ वहाँ सब दौड़ रहा,मानो कुछ जोड़ रहा
दूसरों को देख देखकर कुत्ता भौंकता है यहाँ।

अधखुलती सुंदरियां कागज में भोग यहाँ
नुक्कड़ में जाने पर झल्लाते हैं लोग यहाँ
गीत नहीं गाते, बस चिल्लाते है लोग यहाँ
मानो कुछ पाने को भाग रहे हैं लोग यहाँ।

अरसे से मिला नहीं कोई पहचाना यहाँ
बुझे फानूस सा लटका हिंदी जमाना यहां।
बहकते बवाल में बड़े बड़े भांड यहां
काटने को कुत्ते,धकियाने को सांढ़ यहाँ।

भावना के भूत रोते, जार जार यहाँ
मुरादों के सपने होते ,तार तार यहाँ।
मच्छर ही करते रात की मनुहार यहाँ
लटक सा गया, जीवन का प्यार यहां।

पानी के लिए होते सब हैं बेपानी यहाँ
पानी के लिए कुछ होते पानी-पानी यहाँ.
घर घर मे नेता है,घर में नाता पुराना यहां
चंदे के धंधे मर इबादत का बहाना यहाँ।

मयखाना यहाँ, बुतखाना यहाँ,हर जगह पैखाना यहाँ
खाना खराब होता,कदम कदम पे है दवाखाना यहाँ।
करिश्माई कुछ भी नहीं,बिल्कुल पुराना यहाँ

नया कुछ करना चाहा तो फटा पैजामा यहाँ
खम ठोक बैठे जो नया करतब दिखाने को
देखते ही देखते उखड़ गया शामियाना यहाँ।
कुछ भीतरी बाहरी का गूंजता अफसाना यहां।

बरसात के आगाज में कुछ मंजर पसरता यहाँ
सड़कें तो बहाना है,नदियों का सब मुहाना यहां।
जंगल ही जंगल है खुदाई वो लोगों की लगाई ही
घिरा है जमींदोज भूतों का तहखाना यहाँ
औरतों की बानगी में दिखता मरदाना यहाँ।

सैकड़ों शैतान बड़े बेईमान,पेटू पहलवान यहाँ
पूछे धनवान इंसान बनाने का कारखाना यहां
हुनर बदनाम यहाँ है ,काफी तामझाम यहाँ
तूती छिप बैठी है,देखके नक्कार खाना यहाँ।

©भागवत पाठक"श्यामल"

Thursday, March 22, 2018

श्यामल परिचय

आचार्य श्री भागवत पाठक "श्यामल" संस्कृत और हिन्दी साहित्य के प्रखर विद्वान हैं। उन्होंने सैकड़ों अद्वितीय रचनाएं रची है लेकिन अर्थाभाव में बहुत प्रकाशित, प्रचारित नहीं हो सकी है। आकाशवाणी से प्रसारण होता रहा है। उनकी प्रमुख रचनाओं में "भारतीय काव्य में रासोद्भुति,बाल्मीकि का लोक शिक्षण,विश्वामित्र संहिता,अथ कोकदूतम, अयंग सँगतिः, सुरभारती, सुरवाणी,बौद्धिक क्रांति के युग मे भारत,साम्प्रदायिक एकता की तपोभूमि, भारतीय संस्कृति को बौद्ध धर्म की देन,खैनी महात्म्य,जिसकी रोटी उसकी भैंस,चमचागिरी मंत्रम,भृमरगीत,कृष्ण को देखा, कलंकित,श्रीमद्भागवत वचनामृत, उन्मुक्त तन्त्र, बिखरा गए,गिरिधर,अनायास,हड़ताल,मझधार में,विम्ब,मेरा परिचय जैसी अनगिनत काव्य और लेख शामिल है।
गिरिडीह के जमुआ प्रखण्ड अंतर्गत सुदूरवर्ती गांव बसखारो के निवासी श्यामल रांची,तिसरी, मिर्जागंज में अध्यापन कार्य करने बाद वर्ष 2009 में रामगढ़ उच्च विद्यालय से प्रभारी प्रधानाध्यापक पद से सेवानिवृत होने के बाद बसखारो में बस गए हैं। अब भी अध्ययन में जुटे हुए हैं। उनकी पांडुलिपियों को संग्रहित कर प्रकाशन की दिशा में कार्य किया जा रहा है।

पंकज प्रियम
18.3.2018

उन्मुक्त तन्त्र

उन्मुक्त-तन्त्र
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उन्मुक्त हुई, कविता वनिता
खोकर शृंखलता,संयमिता।
मदिरा से कर, मन विह्वल
देखे जिसने, वे नयन तरल।
रंजित अधरों में, हास लास्य
अंतर सुवास,रसच्युत श्वास।
दुग्धित संचित,अंतः लज्जित
प्रिय संस्पर्शन से रोमांचित।
दिल में नकभी होता विभाग
पाकर नूतन ,जीवन पराग।
स्वच्छन्द बनी ,अब छोड़ राग
खुद अपनाया ,जीवन विराग।
उन्मुक्त तन्त्र का यह विलास
देखा विनाश में ही विकास।
अवरोध हीन आमरण बिना
अपजात गात्र सरसे कितना।
कहां? सुलभ वह मादकता
केवल यह उच्छलन भावुकता।
उन्छित संयम, में ही उपचय
कैसा? यह जीवन अप संसय!
सुंदरता, का होता अपचय
उपयुक्त नहीं जिसका संश्रय।
✍भागवत पाठक"श्यामल"